employment(शिक्षा और रोजगार )

10 Responses to “employment(शिक्षा और रोजगार )”

  1. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:05 अपराह्न #

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  2. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:17 अपराह्न #

    बरनाला, 9 मार्च (निस)। सरकार द्वारा शिक्षा विभाग के अधीन बेरोजगार अध्यापकों की भर्ती संबंधी अपनाई टाल मटोल की नीति के खिलाफ बेरोजगार बी एड अध्यापक फ्रंट, पंजाब ने तीव्र संघर्ष ‘बादल हिलाओ, रोजगार पाओ’ अभियान पंजाब भर में चलाने का ऐलान कर दिया है। इस अभियान तहत गांव-गांव में रैलियां करते हुए 20 मार्च को जिला हैडक्वार्टरों ने सरकार की अर्थी फूंक प्रदर्शन किये जाएंगे तथा 3 अप्रैल को पंजाब भर के बेरोजगार अध्यापक बादल के गांव की ओर कूच करेंगे।
    बेरोजगार बीएड अध्यापक फ्रंट, पंजाब की सूबा कमेटी ने मांग की कि जब तक सरकार बेरोजगार अध्यापकों को रैगूलर भर्ती नहीं करती तब तक उनको बेरोजगारी भत्ता दिया जाना चाहिए। उन्होंने संघर्षों के मैदान में उतरे बेरोजगार पी टी आई अध्यापकों तथा बेरोजगार आर्ट एण्ड क्राफ्ट अध्यापकों को सरकार के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए एक मंच पर आने का अह्वान भी किया।
    पंजाब

  3. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:24 अपराह्न #

    मध्यप्रदेश शासन एवं नैसकॉम तथा सी.एस.आई. भोपाल चेप्टर के तत्वावधान में संयुक्त रूप से एक इंटरेक्टिव मीट का आयोजन आज यहां होटल नूर-उस-सभा में किया गया, जिसमें कि आई.टी.#बी.पी.ओ. में निवेश की संभावना को तलाशने के लिए चर्चा की गई। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय उद्धाटन समारोह के मुख्य अतिथि थे। डॉ. किरन कार्निक, अध्यक्ष, नैसकॉम तथा प्रतिष्ठित आई.टी. कम्पनियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें टी.सी.एस., माइक्रोसाफ्ट, एजीस, जेनर टेक्नोलॉजी, ऑटोडेस्क, अरेना मल्टीमीडिया एवं जैनपेक्ट आदि प्रमुख हैं। मुख्य चर्चा का विषय मध्यप्रदेश में निवेश की नई संभावनाओं को तलाशना, मानव संसाधनों की उपलब्धता तथा आई.टी. उद्योग के लिए आवश्यक अधोसंरचना था।

    श्री कैलाश विजयवर्गीय ने मध्यप्रदेश में उपलब्ध मानव संसाधनों को रेखांकित करते हुए मध्यप्रदेश में उद्योग के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण से अवगत कराया तथा शासन की ओर सभी प्रकार की आवश्यक सुविधाएं एवं निवेश के अवसर उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। उन्होंने विशेषज्ञों को मध्यप्रदेश में व्यापक निवेश की संभावनाओं को देखते हुए निवेश बढ़ाने के उपाय सुझाने पर जोर दिया। श्री विजयवर्गीय ने कहा कि चर्चा में यह बिन्दु भी जोड़ा जाये कि अपार संसाधनों के बावजूद रुकावटें दूर करने की क्या संभावनाएं हैं। अगर हम सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आ रही रुकावटें दूर कर पाये तो यह इस कार्यशाला की सार्थकता होगी।

    नेसकाम के अध्यक्ष डॉ. किरण कार्निक ने कहा कि वह मध्यप्रदेश में निवेश की संभावनाओं का अध्ययन करके सूचना प्रौद्योगिकी में निवेश और रोजगार बढ़ाने की कोशिश करेंगे। उन्होंने कहा कि काम का प्रस्तुतिकरण और टीमवर्क की जानकारी छात्रों को देना चाहिये। अभी हम जो पढ़ा रहे हैं वह बहुत पुराना पाठयक्रम है। पाठयक्रम में नई गतिविधियां शामिल कर हम रोजगार के अवसर बढ़ा सकते हैं।

    चर्चा में वक्ताओं ने कहा कि मध्यप्रदेश शासन द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निवेश को प्रदेश में बढ़ाने के लिए कई प्रकार की पहल की गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय से गठित टास्कफोर्स के सुझावों पर आधारित मध्यप्रदेश शासन द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी की नीति में कई प्रकार के प्रोत्साहनों का समावेश किया गया है। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा इस प्रकार की पहल को अधिक से अधिक सूचना प्रौद्योगिकी निवेशकों के बीच प्रचार-प्रसार किये जाने की आवश्यकता है जिससे कि निवेश की रफ्तार तेजी से बढ़े एवं मध्यप्रदेश में उपलब्ध संभावनाओं का अधिकाधिक उपयोग हो सके।

    उद्योग- शैक्षणिक परिचर्चा सत्र के प्रमुख श्री किरन कार्निक, अध्यक्ष नैसकॉम थे। जिसमें प्रोफेसर श्री पी.बी. शर्मा, उप कुलपति, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी, विश्वविद्यालय, श्री आर.एस. सिरोही, उप कुलपति, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, श्री ए.मिश्रा उप कुलपति माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, श्री राघवचन्द्रा, प्रमुख सचिव, तकनीकी शिक्षा मुख्य वक्ता थे। चर्चा में मध्यप्रदेश शासन इसमें वर्तमान में तकनीकी शिक्षा का वर्तमान स्तर, उपयोगिता और उद्योगों में उपलब्धता पर विचार हुआ। शासन के तकनीकी शिक्षा के बदलते परिवेश में निवेश बदलते परिवेश में लचीले पाठयक्रम आई.टी. उद्योगों के अनुसार बनाने पर विचार हुआ है। मानव संसाधन की संभवनाओं पर श्री कोशि डेनिल, टी.सी.एस. और श्री अंशु खण्डेलवाल, जैनपेक्ट ने प्रकाश डाला। आई.टी. उद्योग में नए क्षेत्रों जैसे एनिमेशन इंडस्ट्री पर श्री सलिल देसाई एप्टेक मल्टीमीडिया ने अवगत कराया। आई.टी. उद्योग की जरूरतों को समझने के लिए श्री विद्यासागर पात्रो और जयजीत भट्टाचार्य, सनमाईको सिस्टम, श्री श्याम कुड्डयाटी, जेनसर टेक्नोलॉजी एवं माइक्रोसाफ्ट ने प्रस्तुतिकरण किया।

  4. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:28 अपराह्न #

    नई दिल्ली (भाषा): रोजगार को श्रम और ज्ञान के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शुक्रवार को कहा कि दफ्तरी रोजगार के जमाने लद गए। अब हमें रोजगार के ऐसे अवसर चाहिए जो आज की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।
    वाजपेयी ने यहां विज्ञान भवन में ग्रामीण औद्योगीकरण पर राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि कृषि व ग्रामीण उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्होंने कहा कि भारत के संतुलित विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ने के लिए यह जरूरी है कि गांव , गरीब और किसानों की जरूरतों को पूरा किया जाए। इस लक्ष्य को हमें इस तरह पूरा करना होगा , जिससे ग्रामीण जनता को गांवों में या आसपास ही रोजगार मिले।
    प्रधानमंत्री ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि व कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए जरूरी ढांचागत सुविधाएं मुहैया कराना जरूरी है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के सुझाव पर अमल करना होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति की परिकल्पना में चार प्रकार की योजना है , जिसमें गांवों के लिए अच्छे रास्ते , बिजली व आवागमन , उन्हें टेलीकॉम व इंटरनेट से जोड़ना , अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करना और अच्छे बाजारों से संपर्क बनाना शामिल है। उन्होंने कहा कि आज ग्रामीण भारत में इन चारों क्षेत्रों में तस्वीर बदल रही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत साठ हजार करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई है।
    राष्ट्रीय राजमार्ग योजना और रेल विकास योजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आजादी के बाद पचास सालों में केवल 550 किलोमीटर के चार लेन के राजमार्ग बनाए गए। आज स्थिति यह है कि प्रतिदिन पांच किलोमीटर की रफ्तार से चार लेन के राजमार्ग बनाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस योजना से रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ-साथ न उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।
    हमारी राय: प्रधानमंत्री की इस राय से असहमत नहीं हुआ जा सकता। रोजगार को लेकर विजन मौजूद है , लेकिन असल चुनौती उसे अमल में उतारने की है। इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता में रहना चाहिए।

  5. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:35 अपराह्न #

    दाखिले का दौर लगभग खत्म हो चुका है। इस दौरान एक खेदजनक स्थिति यह दिखी है कि युवाओ का रुझान उच्च शिक्षा की ओर कमतर होता जा रहा है। जो युवा इस क्षेत्र में आ भी रहे है उसके पीछे उनकी अलग तरह की मजबूरी दिख रही है। दरअसल शिक्षा में रोजगार की अहमियत सबसे बड़ी चीज बना दी गयी है, इसलिए युवाओ का लगाव प्रोफेशनल कोर्स की ओर बढ़ा है और उन्हे उच्च शिक्षा अप्रासंगिक सी लगने लगी है। यह शिक्षा जगत के लिए एक खतरनाक संकेत है और आने वाले 15- 20 सालो मे इस ओर संतुलित रवैया नही अपनाया गया तो समाज एकांगी व्यवस्था और विकृति की ओर बढ़ेगा। हमारे सोचने-समझने के रवैये मे इस कदर परिवर्तन आएगा कि हम सामाजिक प्राणी न रह कर मशीनी मानव मे तब्दील हो जाएंगे। आखिर शिक्षा के कुछ सामाजिक सरोकार भी है। हम उसे सिर्फ और सिर्फ व्यापार के साथ नही जोड़ सकते। आज जिस धड़ल्ले से प्रोफेशनल कोर्स के इंस्टीट्यूट खुल रहे है और बारहवी पास करते ही उसमे दाखिला लेने को छात्र-छात्राएं मचल पड़े है, उससे शिक्षा के सही उद्देश्य को हासिल करना दूर की कौड़ी लग रही है। मेरी समझ है कि छात्राे के लिए जनरल साइंस, इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि विषयो की भूमिका कही से भी प्रोफेशनल कोसो से अधिक है। हां! इसे रोजगारपरक बनाये जाने की थोड़ी जरूरत है। फिर एक चीज और समझने की जरूरत है कि कई

    प्रोफेशनल कोर्स ऐसे है जहां अच्छी सफलता के लिए जरूरी है कि आप उच्च शिक्षा मे निपुण हो। एक उदाहरण जर्नलिज्म का लिया जा सकता है। जाहिर है इस क्षेत्र मे उनकी जड़ंे ज्यादा मजबूत होती है जिन्होने उच्च शिक्षा हासिल की हो। इसी तरह के कई उदाहरण साइंस के विषयो से जुड़ाव रखने वाले प्रोफेशनल कोसरे मे भी है। कहने का मतलब साफ है कि उच्च शिक्षा कई प्रोफेशनल शिक्षा की भी आधारभूमि है और बगैर इसे हासिल किये आप उच्च कोटि के मानव संसाधन मैनेजर नही हो सकते। सरकार और शिक्षण संस्थाओ को चाहिए कि वे उच्च शिक्षा को रोजगार से जोड़ें और इससे जुड़ी नयी सम्भावनाएं तलाशें। समाज भी इस तथ्य को समझे कि आनन-फानन मे पढ़ाई कर आप कुछ ही दिनो मे पैसे कमाने लायक जरूर हो सकते है लेकिन यह समाज और इकानॉमी के ठोस विकास को खोखला ही करेगा। जहां तक रोजगार की बात है, यह साफ है कि प्रोफेशनल कोर्स बेहतर स्थिति मे है लेकिन महज इसी कारण उच्च शिक्षा को इग्नोर नही किया जा सकता। यहां एक आदर्श स्थिति यह हो सकती है कि सारे प्रोफेशनल कोर्स को उच्च शिक्षा से जोड़ा जाए। जैसे इतिहास व पुरातत्वशास्त्र के अध्ययन को हम टूरिज्म व कल्चर के साथ जोड़ दे। अंग्रेजी के उच्च भाषाई ान को कॉल सेटर तथा विदेशी भाषाओ के ान को टूरिज्म व होटल इंडस्ट्ी के जॉब से जोड़ दे। अभी के हालात मे लोगो का रुझान साफ तौर पर प्रोफेशनल कोर्स की ओर घातक स्तर पर पहुंच गया है। कुछ क्षेत्राे को छोड़ दे तो महज कोर्स करना ही नौकरी की गारंटी है, ऐसा नही। फिर दूसरी तरफ उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे साधनो का अभाव है। कई जगह ठीक विश्वविद्यालय नही है तो कई जगह टीचर नही। लाइब्रेरी, लैब आदि बुनियादी सुविधाएं अधिकतर जगह से नदारद है। ऐसे मे छात्रों को सही उच्च शिक्षा मिल रही है, यह भी संदेहजनक है। वैसे सरकार ने कई जगह केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने और उच्च शिक्षा से जुड़े कई
    अन्य सुविधाएं देने की घोषणा कर इस ओर ध्यान देने की इच्छाशक्ति जता कर इस ओर से सकारात्मक संदेश दिया है लेकिन आगे देखना है कि इस पर कितना अमल किया जाता है। (दिल्ली विवि में डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. विज से आशुतोष प्रताप सिंह की बातचीत पर आधारित आलेख

  6. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:37 अपराह्न #

    हमारे देश में ऐसे कई छात्र हैं, जो शिक्षित तो हैं, पर जॉब करने के लायक नहीं। यह स्थिति इसलिए आई है, क्योंकि इनकी शिक्षा तकनीकी और प्रफेशनल न होकर सिर्फ डिग्री ओरिएंटेड है। यह सच है कि जम्मू और कश्मीर में हिंसा की वजह से पढ़ाई करना मुश्किल है और जॉब पाना उससे भी अधिक कठिन, पर जब हमने देश के अन्य राज्यों का भ्रमण किया, तो हमें वहां भी ऐसे छात्रों की काफी तादाद मिली, जो शिक्षित होने के बाद भी बेरोजगार हैं।

    ये लोग दसवीं से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री लिए हुए थे। ऐसे में यह साफ है कि हमें अपने एजुकेशन सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत है।

  7. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:38 अपराह्न #

    स्टूडेंट्स छोटे-छोटे कोर्स करके कम उम्र में जॉब करना शुरू कर देते हैं। इसे सही नहीं कहा जा सकता। हकीकत यह है कि इससे देश को घाटा ही होता है। आज मंदी की वजह से नौकरियां जा रही हैं। अगर छात्रों ने उच्च शिक्षा ली होती और वे अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट होते, तो जॉब खोने वालों की संख्या काफी कम होती।

    भारत में भले ही पिछले कुछ सालों में वोकेशनल और प्रफेशनल कोर्सेज की पढ़ाई पर काफी जोर दिया गया, लेकिन निजी और सरकारी, दोनों तरह के इंस्टिट्यूट्स में शैक्षणिक स्तर को बेहतर करने पर तवज्जो नहीं दी गई। देश में चंद ही संस्थान उच्च गुणवत्ता के साथ टीचिंग और रिसर्च को अंजाम दे रहे हैं। भारत में सिर्फ डिग्री लेने पर जोर दिया जाता है। इसमें सुधार की जरूरत है।

    हद तो यह है कि स्टूडेंट्स नियमित रूप से कॉलेज जाना भी पसंद नहीं करते। ऐसे में नॉलेज की बात काफी पीछे छूट जाती है। आज उच्च शिक्षा को और अधिक आकर्षक बनाने की जरूरत है। छात्र उच्च शिक्षा से दूर हो रहे हैं, जिससे रिसर्च कार्य खासा प्रभावित हो रहा है। अगर रिसर्च नहीं होगी, तो हम तकनीकी रूप से काफी पीछे छूट जाएंगे।

    देश में पढ़ाई का खास मकसद होना चाहिए, जिससे युवा अपनी भूमिका समझ सकें। इसके लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी को और मजबूत करना होगा। ऐसे तरीके भी खोजने होंगे, जिनसे कम लागत पर अच्छी शिक्षा उपलब्ध हो सके। देश में अभी 500 से भी अधिक यूनिवर्सिटीज की आवश्यकता है। हमारे पास मात्र 350 विश्वविद्यालय हैं। हालत सुधारने के लिए ज्यादा से ज्यादा निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति मिलनी चाहिए।

    हमारे यहां यह भी समस्या है कि युवा खुद करियर को लेकर गंभीर नहीं होते। वे अपनी रुचि के करियर की बजाय कोई भी कोर्स कर लेते हैं। यहां के युवा बॉलिवुड और क्रिकेट के बारे में बातें करना खूब पसंद करते, लेकिन शिक्षा और रोजगारपरक बातें काफी कम होती हैं।

    इससे देश में कई मुख्य मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इनमें शिक्षा का विकास भी शामिल है। भारत के हर राज्य की अलग शिक्षा पद्घति है, जिनमें से अधिकतर में सुधार की गुंजाइश है। इसके लिए मिलकर प्रयास करने होंगे।

    यहां शिक्षा के गिरते स्तर की एक वजह यूनिवर्सिटीज पर जरूरत से ज्यादा दबाव भी है। हर संस्थान किसी न किसी यूनिवर्सिटी से संबद्ध होता है। दक्षिण भारत में तो ऐसे कई राज्य हैं, जहां एक यूनिवर्सिटी के अंदर हजारों कॉलेज हैं। इससे इन कॉलेजों पर यूनिवर्सिटी की पकड़ मजबूत नहीं रहती और शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं हो पाता।

    इससे बचने के लिए छोटी यूनिवर्सिटीज बनानी चाहिए। तभी कॉलेजों पर पूरा ध्यान दिया जा सकेगा। यूनिवर्सिटीज में ग्रेडिंग सिस्टम होना चाहिए। जब दुनिया के कई देशों में यह पद्घति लागू है, तो फिर हम यहां क्यों न लागू करें?

  8. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:40 अपराह्न #

    विज्ञान की ओर छात्रों का रुझान कम हो रहा है। दरअसल, छात्रों को लगता है कि साइंस में करियर बनने में काफी वक्त लग जाएगा और अगर बन भी जाए, तो अन्य सेक्टर्स की तुलना में पैसा और सुविधा कम ही मिलेंगे। ऐसे में यह जरूरी है कि हम विज्ञान विषय की शिक्षा प्रणाली को अधिक आकर्षक और रोजगारपरक बनाएं। ऐसे स्कूल और कॉलेज खोलने की जरूरत है, जो छात्रों की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सके और उन्हें रिसर्च के लिए भी प्रेरित करें। इसके लिए हमें अधिक ट्रेंड और जानकार टीचरों की जरूरत होगी।

  9. Dinesh Singh Rawat अप्रैल 12, 2011 at 2:43 अपराह्न #

    जो युवा इस क्षेत्र में आ भी रहे हैं उसके पीछे उनकी अलग तरह की मजबूरी दिख रही है। दरअसल शिक्षा में रोजगार की अहमियत सबसे बड़ी चीज बना दी गयी है, इसलिए युवाओं का लगाव प्रोफेशनल कोर्स की आ॓र बढ़ा है और उन्हें उच्च शिक्षा अप्रासंगिक सी लगने लगी है। यह शिक्षा जगत के लिए एक खतरनाक संकेत है और आने वाले 15-20 सालों में इस आ॓र संतुलित रवैया नहीं अपनाया गया तो समाज एकांगी व्यवस्था और विकृति की आ॓र बढ़ेगा। हमारे सोचने-समझने के रवैये में इस कदर परिवर्तन आएगा कि हम सामाजिक प्राणी न रह कर मशीनी मानव में तब्दील हो जाएंगे।
    आखिर शिक्षा के कुछ सामाजिक सरोकार भी हैं। हम उसे सिर्फ और सिर्फ व्यापार के साथ नहीं जोड़ सकते। आज जिस धड़ल्ले से प्रोफेशनल कोर्स के इंस्टीट्यूट खुल रहे हैं और बारहवीं पास करते ही उसमें दाखिला लेने को छात्र-छात्राएं मचल पड़े हैं, उससे शिक्षा के सही उद्देश्य को हासिल करना दूर की कौड़ी लग रही है। मेरी समझ है कि छात्रों के लिए जनरल साइंस, इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि विषयों की भूमिका कहीं से भी प्रोफेशनल कोर्सों से अधिक है। हां! इसे रोजगारपरक बनाये जाने की थोड़ी जरूरत है। फिर एक चीज और समझने की जरूरत है कि कई प्रोफेशनल कोर्स ऐसे हैं जहां अच्छी सफलता के लिए जरूरी है कि आप उच्च शिक्षा में निपुण हों। एक उदाहरण जर्नलिज्म का लिया जा सकता है। जाहिर है इस क्षेत्र में उनकी जड़ें ज्यादा मजबूत होती हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की हो। इसी तरह के कई उदाहरण साइंस के विषयों से जुड़ाव रखने वाले प्रोफेशनल कोर्सो में भी है।
    कहने का मतलब साफ है कि उच्च शिक्षा कई प्रोफेशनल शिक्षा की भी आधारभूमि है और बगैर इसे हासिल किये आप उच्च कोटि के मानव संसाधन मैनेजर नहीं हो सकते। सरकार और शिक्षण संस्थाओं को चाहिए कि वे उच्च शिक्षा को रोजगार से जोड़ें और इससे जुड़ी नयी सम्भावनाएं तलाशें। समाज भी इस तथ्य को समझे कि आनन-फानन में पढ़ाई कर आप कुछ ही दिनों में पैसे कमाने लायक जरूर हो सकते हैं लेकिन यह समाज और इकानॉमी के ठोस विकास को खोखला ही करेगा। जहां तक रोजगार की बात है, यह साफ है कि प्रोफेशनल कोर्स बेहतर स्थिति में हैं लेकिन महज इसी कारण उच्च शिक्षा को इग्नोर नहीं किया जा सकता। यहां एक आदर्श स्थिति यह हो सकती है कि सारे प्रोफेशनल कोर्स को उच्च शिक्षा से जोड़ा जाए। जैसे इतिहास व पुरातत्वशास्त्र के अध्ययन को हम टूरिज्म व कल्चर के साथ जोड़ दें। अंग्रेजी के उच्च भाषाई ज्ञान को कॉल सेंटर तथा विदेशी भाषाओं के ज्ञान को टूरिज्म व होटल इंडस्ट्री के जॉब से जोड़ दें।

  10. shailender अक्टूबर 31, 2011 at 3:50 अपराह्न #

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